एक वीरान मंज़िल
तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी कीक्यों नहीं फिर देखते हो
एक मुद्दत से मेरे दिल पे जमी धूल
इक भी नक्श-ए-पा नहीं जिसपे किसी के
आश्ना है जो फ़क़त तन्हाई से ही
एक पगडंडी सी शायद
जिसपे चलना भी हो ज़हमत
जाती है जो सिर्फ़ मेरी सिसकियों तक
मेरी बद-बख़्ती मेरी अफ़्सुर्दगी तक
और फिर भी
तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की
क्यों समझते हो तुम ऐसा?
- अच्युतम यादव 'अबतर'
इक भी नक्श-ए-पा नहीं जिसपे किसी के
आश्ना है जो फ़क़त तन्हाई से ही
एक पगडंडी सी शायद
जिसपे चलना भी हो ज़हमत
जाती है जो सिर्फ़ मेरी सिसकियों तक
मेरी बद-बख़्ती मेरी अफ़्सुर्दगी तक
और फिर भी
तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की
क्यों समझते हो तुम ऐसा?
- अच्युतम यादव 'अबतर'

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